आँखें खुली तो सत्या ने खुद को बिस्तर पर पाया। पहले तो चौंक कर उठ बैठा, यहाँ वहाँ देखा, और जब नज़र टेबल पर पड़ी घड़ी पर गई तो ध्यान आया कि वह अपने ही घर में था। उस पर भी एक पल बाद होश आया कि समय शाम का था। शायद नींद गहरी थी। काफ़ी दिन हुए थे उसे इस तरह बेधड़क सोए। छुट्टियाँ अक्सर रोज़मर्रा के कामों में ही बीत जाती थीं और बचे-खुचे खाली समय में उसे किताबें पढ़ना ही भाता था। आम तौर पर तो वह दिन में सोया भी नहीं करता था पर इस बार बहुत दिनों के बाद एक लंबा सप्ताहांत मिला था। छुट्टी का दिन, भरी दोपहर, और राजमा-चावल। ना चाहते हुए भी महाशय नींद की आग़ोश में विलीन हो गए थे।
फिलहाल शाम के पाँच बजे थे। आखिरकार एक लंबी अंगड़ाई लेकर उसने बिस्तर छोड़ा। इस शाम को बस अब अदरक की तासीर ही बेहतर बना सकती थी। दस मिनट बाद सत्या हाथ में चाय का प्याला लिए बैठक के पास वाली खिड़की पर बैठा था। चौथी मंज़िल की इस खिड़की पर बैठकर अक्सर वह आते जाते लोगों को देखता और उनकी दिनचर्या का संभावित मूल्यांकन करता। खुराफ़ात हो या रचना, तरोताज़ा दिमाग दोनों के प्रति कल्पनाशील होता है। आज भी मन कुछ ऐसा ही था। एक सरसरी निगाह से उसने अपने विकल्प टटोले। साइकिल लेकर खड़ा वह अंडे वाला, जो शायद आज की बिक्री का अनुमान लगा रहा था। उबलती चाय में कड़छी घुमाता वह चायवाला, जो अपने ग्राहकों की राह में यहाँ-वहाँ झाँक रहा था। उसी के बगल, एक कोने में धूम्रपान करता वह युवक जो किसी के इंतज़ार में बड़ी बेसब्री से बार-बार घड़ी देख रहा था। वह अधेड़-उम्र महिला, जो रिक्शा से उतर कर एक हाथ से अपने पर्स में पैसे टटोल रही थी और दूसरे से रफूचक्कर हो जाने को तैयार अपने नन्हे बालक का हाथ थामे हुए थी। या फिर वह मोटरसाइकिल चालक, जो आती जाती गाड़ियों के बीच से विपरीत दिशा में निकल जाने की कोशिश में था। जब भी सत्या इस खिड़की पर बैठता उसे कोई ना कोई दिलचस्प मिल ही जाता था। आज भी विकल्प तैयार थे, पर कुछ तय करने से पहले ही एक मद्धिम सी आवाज़ उसके कानों में आ पड़ी।
पलटकर देखा तो एक छोटी सी मैना उसके पास बैठी थी। बड़े शहरों के घरों में कबूतरों और कौवों का आवागमन आम बात है, पर एक मैना को यूँ अपने घर की खिड़की पर बैठे सत्या ने पहली बार देखा था। पीली चोंच, भूरा रंग, काला माथा, और पंखों के किनारे पतली सफ़ेद धारियाँ। उसके आवरण में ऐसा निखार था मानो किसी प्रवीण चित्रकार की नवजात रचना हो। पीली धारियों से घिरी उसकी काली आँखें किसी कथकली नृत्यांगना सी प्रतीत होती थीं। साधारण होते हुए भी उसकी काया इतनी मनोरम थी कि सत्या कुछ देर एकटक उसे देखता रहा। फिर उसने थोड़ा करीब से देखना चाहा, पर डर था कि कही वह उड़ न जाए। कुछ देर मैना के यूँही बैठे रहने से उसकी हिम्मत बढ़ी। हाथ बढ़ा कर उसने हलके से मैना के पंखों पर फेरा, लेकिन बजाय उड़ने के एक धीमी चहक के साथ वह एक कदम खिसक गई। थोड़ा रुक कर सत्या ने फिर कोशिश की। इस बार चहक थोड़ी तेज़ हुई पर मैना ने फिर भी कुछ ख़ास विरोध न किया। अब सत्या को शंका हुई। ध्यान से देखा तो पाया कि उसका एक पंख अपनी संरेखा से परे था। चोट दिखाई नहीं पड़ रही थी लेकिन प्रत्यक्ष रूप से मैना उड़ने में असमर्थ थी।
अचानक मैना खिड़की के एक कोने से दूसरे तक फुदकते हुए चहकने लगी। यह उड़ जाने की आतुरता के बजाय कुछ कहने की अधीरता ज़्यादा मालूम होती थी। लेकिन ना तो मैना के पास कहने को शब्द थे और ना सत्या के पास उसे समझने का कोई चारा। वह उठा और एक गत्ते का छोटा डिब्बा ले आया। उसमें एक तौलिया मोड़कर बिछाया, कुछ बिस्कुट के टुकड़े बिखेरे और खिड़की के अंदर की तरफ रख दिया। फिर धीरे से मैना को उठाकर डिब्बे में रख दिया। मैना चुप हो गई। शायद वह अचानक हुए इस बदलाव से स्तब्ध थी। कुछ कदम यहाँ वहाँ चलकर उसने डिब्बे का मुआयना किया और फिर एक कोने में आकर चुपचाप बैठ गई। थोड़ी देर में उठी, जैसे कुछ याद आया हो, और डिब्बे पर चढ़कर चहकने लगी। फिर उतरकर डिब्बे का चक्कर लगाया और वापिस अपनी जगह पर आकर बैठ गई। कुछ देर यूँ ही चलता रहा। वह कभी डिब्बे का चक्कर लगाती, कभी ऊपर चढ़ जाती, और फिर वापिस बैठ जाती। मानो अपनी आपबीती सुना रही हो। पर उसकी चहक में अब वो पहले जैसी बेचैनी नहीं थी। शायद सत्या की उपस्तिथि से उसे कुछ मनोबल मिला था। सत्या भी वहीं बैठा उसकी चहलकदमी देखता रहा। कुछ ही पलों में उसे उस नन्हे से पक्षी में आत्मीयता झलकने थी।
सप्ताह के अंत तक मैना सत्या से भली-भांति परिचित हो चुकी थी। अब वह मन-मर्ज़ी से यहाँ-वहाँ फुदकती रहती। घर का कोई कोना उसकी पहुँच से अछूता नहीं बचा था। उसकी हालात में भी थोड़ा सुधार था लेकिन अभी भी वह उड़ ना पाती थी। सत्या को भी अब उसकी आदत सी हो चली थी। सुबह उसी की चहक से उठता और शाम को भी अन्धेरा होने तक उसी के पास बैठा रहता। बस इसके बीच का वक़्त उसे थोड़ा भारी पड़ता था क्योंकि वह उसे ऑफिस में गुज़ारना पड़ता था। पर जितना उससे बनता वो अपना वक़्त मैना को ही देता।
आज शुक्रवार था। सत्या ऑफिस से जल्दी निकल गया था। रास्ते में रुक कर उसने कुछ नमकीन बिस्कुट ख़रीदे। मैना इन्हें बड़े चाव से खाती थी। आज शाम की चाय उसी के साथ बैठ के पीनी थी। अपने इस बचकाने ख़्याल से वह मन ही मन मुस्काया। उसकी पसंदीदा खिड़की अब उसे और भी प्रिय हो गई थी। गंभीर, जटिल, सहज, हैरान करने वाले और ना जाने कितने ही विविध व्यक्तित्वों का स्रोत थी यह खिड़की। लेकिन पहली बार इस खिड़की पर किसी अनुभव ने वास्तविकता का रूप धारण किया था। और आज वही वास्तविकता मैना के रूप में सत्या को एक आत्मिक शक्ति की अनुभूति दे रही थी। शायद वह भी उसकी राह देख रही हो। दरवाज़ा खुलते ही उसका शोर शुरू हो जाएगा। अगले दिन ऑफिस की छुट्टी होने के कारण वक़्त पर कोई पाबन्दी भी नहीं थी।
घर पहुँच कर उसने धीरे से दरवाज़ा खोला और सीधे खिड़की के पास गया। डिब्बे में बिस्कुट के कुछ टुकड़ों के सिवाय वहाँ कुछ नहीं था।
पलटकर देखा तो एक छोटी सी मैना उसके पास बैठी थी। बड़े शहरों के घरों में कबूतरों और कौवों का आवागमन आम बात है, पर एक मैना को यूँ अपने घर की खिड़की पर बैठे सत्या ने पहली बार देखा था। पीली चोंच, भूरा रंग, काला माथा, और पंखों के किनारे पतली सफ़ेद धारियाँ। उसके आवरण में ऐसा निखार था मानो किसी प्रवीण चित्रकार की नवजात रचना हो। पीली धारियों से घिरी उसकी काली आँखें किसी कथकली नृत्यांगना सी प्रतीत होती थीं। साधारण होते हुए भी उसकी काया इतनी मनोरम थी कि सत्या कुछ देर एकटक उसे देखता रहा। फिर उसने थोड़ा करीब से देखना चाहा, पर डर था कि कही वह उड़ न जाए। कुछ देर मैना के यूँही बैठे रहने से उसकी हिम्मत बढ़ी। हाथ बढ़ा कर उसने हलके से मैना के पंखों पर फेरा, लेकिन बजाय उड़ने के एक धीमी चहक के साथ वह एक कदम खिसक गई। थोड़ा रुक कर सत्या ने फिर कोशिश की। इस बार चहक थोड़ी तेज़ हुई पर मैना ने फिर भी कुछ ख़ास विरोध न किया। अब सत्या को शंका हुई। ध्यान से देखा तो पाया कि उसका एक पंख अपनी संरेखा से परे था। चोट दिखाई नहीं पड़ रही थी लेकिन प्रत्यक्ष रूप से मैना उड़ने में असमर्थ थी।
अचानक मैना खिड़की के एक कोने से दूसरे तक फुदकते हुए चहकने लगी। यह उड़ जाने की आतुरता के बजाय कुछ कहने की अधीरता ज़्यादा मालूम होती थी। लेकिन ना तो मैना के पास कहने को शब्द थे और ना सत्या के पास उसे समझने का कोई चारा। वह उठा और एक गत्ते का छोटा डिब्बा ले आया। उसमें एक तौलिया मोड़कर बिछाया, कुछ बिस्कुट के टुकड़े बिखेरे और खिड़की के अंदर की तरफ रख दिया। फिर धीरे से मैना को उठाकर डिब्बे में रख दिया। मैना चुप हो गई। शायद वह अचानक हुए इस बदलाव से स्तब्ध थी। कुछ कदम यहाँ वहाँ चलकर उसने डिब्बे का मुआयना किया और फिर एक कोने में आकर चुपचाप बैठ गई। थोड़ी देर में उठी, जैसे कुछ याद आया हो, और डिब्बे पर चढ़कर चहकने लगी। फिर उतरकर डिब्बे का चक्कर लगाया और वापिस अपनी जगह पर आकर बैठ गई। कुछ देर यूँ ही चलता रहा। वह कभी डिब्बे का चक्कर लगाती, कभी ऊपर चढ़ जाती, और फिर वापिस बैठ जाती। मानो अपनी आपबीती सुना रही हो। पर उसकी चहक में अब वो पहले जैसी बेचैनी नहीं थी। शायद सत्या की उपस्तिथि से उसे कुछ मनोबल मिला था। सत्या भी वहीं बैठा उसकी चहलकदमी देखता रहा। कुछ ही पलों में उसे उस नन्हे से पक्षी में आत्मीयता झलकने थी।
सप्ताह के अंत तक मैना सत्या से भली-भांति परिचित हो चुकी थी। अब वह मन-मर्ज़ी से यहाँ-वहाँ फुदकती रहती। घर का कोई कोना उसकी पहुँच से अछूता नहीं बचा था। उसकी हालात में भी थोड़ा सुधार था लेकिन अभी भी वह उड़ ना पाती थी। सत्या को भी अब उसकी आदत सी हो चली थी। सुबह उसी की चहक से उठता और शाम को भी अन्धेरा होने तक उसी के पास बैठा रहता। बस इसके बीच का वक़्त उसे थोड़ा भारी पड़ता था क्योंकि वह उसे ऑफिस में गुज़ारना पड़ता था। पर जितना उससे बनता वो अपना वक़्त मैना को ही देता।
आज शुक्रवार था। सत्या ऑफिस से जल्दी निकल गया था। रास्ते में रुक कर उसने कुछ नमकीन बिस्कुट ख़रीदे। मैना इन्हें बड़े चाव से खाती थी। आज शाम की चाय उसी के साथ बैठ के पीनी थी। अपने इस बचकाने ख़्याल से वह मन ही मन मुस्काया। उसकी पसंदीदा खिड़की अब उसे और भी प्रिय हो गई थी। गंभीर, जटिल, सहज, हैरान करने वाले और ना जाने कितने ही विविध व्यक्तित्वों का स्रोत थी यह खिड़की। लेकिन पहली बार इस खिड़की पर किसी अनुभव ने वास्तविकता का रूप धारण किया था। और आज वही वास्तविकता मैना के रूप में सत्या को एक आत्मिक शक्ति की अनुभूति दे रही थी। शायद वह भी उसकी राह देख रही हो। दरवाज़ा खुलते ही उसका शोर शुरू हो जाएगा। अगले दिन ऑफिस की छुट्टी होने के कारण वक़्त पर कोई पाबन्दी भी नहीं थी।
घर पहुँच कर उसने धीरे से दरवाज़ा खोला और सीधे खिड़की के पास गया। डिब्बे में बिस्कुट के कुछ टुकड़ों के सिवाय वहाँ कुछ नहीं था।